पहले सुनाई देती है लोकल ट्रेन, प्लेटफ़ॉर्म पर उमड़ते यात्रियों के बीच खड़खड़ाते पहिए। फिर आते हैं डब्बावाले, टिफ़िन के डिब्बों की कतारें आगे बढ़ाते हुए एक-दूसरे को आवाज़ लगाते। शाम तक आवाज़ बदलकर मरीन ड्राइव की सी वॉल से टकराती लहरों की हो जाती है, जहां आधा शहर हवा खाने आता है।
छत्रपति शिवाजी टर्मिनस की गॉथिक मीनारों के पार शहर उत्तर की ओर बांद्रा की शॉपिंग गलियों से होता हुआ संजय गांधी नेशनल पार्क के तेंदुओं वाले जंगलों तक जाता है। यहां साल भर गर्मी रहती है, अक्टूबर से मई तक सूखा और जून से सितंबर तक मानसून की मूसलाधार बारिश। एक लोकल फ्रेंड वे दरवाज़े खोल सकता है जिन पर आप खुद दस्तक नहीं देते, जैसे किसी परिवार की रसोई या ऐसा कोना जिसका ज़िक्र किसी गाइडबुक में नहीं।












